Thursday, 15 December 2011

हे इश्वर ! कर निर्माण एक नए युग का 
अपने साहस  का तुम प्रमाण दे ,
हर पाशान ह्रदय हो  द्रवित द्रवित
ऐसे तू अब वरदान दे !!

धमनी में जो अग्नि बन दौड़े
ऐसा तू अब रक्त दे
उत्थान  कर सके जो पतित युग का
ऐसा तू हस्त ,सख्त  दे !!!

क्यारी क्यारी जो बोये बीज कर्म का
ऐसे तू अब किसान दे ,
कर सके रचना एक स्वर्णिम युग का
ऐसे तू  अब इंसान  दे !!!

Monday, 12 December 2011

 इंसानों का इंसानियत पर वार है
हैवानियत इस युग का सार है
दावानल सा फ़ैल रहा है
भ्रष्टाचार का इस देश पर प्रहार है

जागो !

दरार है अब बाँध में 
जागो ! सैलाब  जायेगा
जन ,जीवनसपनेउम्मीद 
सब अपने संग बहा ले जायेगा !
                  दो मुट्ठी मिटटी ले
                  विकट दरार को भर दो
                  बहा दो पसीना तन मन का
                   हर जतन आज तुम कर लो !
हाथ तुम भी अपना लगा दो
युग तेरा आभारी कहलायेगा
आज शक्ति, युक्ति , भक्ति अपनी दिखा दो
वरना हर तरफ बस पानी....खारा पानी, रह जायेगा !!!!
           

Saturday, 10 December 2011

Ek Tukda Dhoop.....

Ek tukda dhoop mere chappar se chaan mere ghar mein ghus aaya
aasan grahan kiya ek kone mein
 nazrein utha mujhe dekh muskuraya
maine poocha “arrey tu yahan kyu aaya...??
basta tha andhiyara yahan..tumne usse kyu bhagaya?”
bola khel raha tha main andiyare ke sang lukka chhippi ka khel
mujhe toh chhupna tha, har ghar mein thi meri parchhayi..
Bas tere hi ghar thi tanhayi....
Fir mere mann mein aaya ek soch
maine poocha “kab jaaoge?”
“rahoonga yahin..... jab tak andiyara mujhe nahi leta hai khoj....”
Maine anmane ho kar kaha” yeh kya zabardasti hai”
dhoop ithlata hua bola” aye isaan teri kya hasti hai
main sooraj ka hoon saathi
uske diye ka hoon baati
roshan karne de tera ghar
le mujhe mutti mein tu bhar
rakh de apne dil ke kisi kone  mein
ek din meri bhi zaroorat hogi tujhe
Bawra ho tu khojega mujhe
Mil na paaonga...fir kisi khel mein kho jaoonga
yaad aayegi tumhe meri yeh baat
tere dil mein reh jayegi...raat...kaali andhiyari raat...”

मुट्ठी में इन्द्रधनुष

बचपन में इन्द्रधनुष देख अक्सर सोचा करती
क्या आसमा में रंग तितलियाँ है भरती?
क्या परिया इस रास्ते आती है ज़मीन पर
कैसे ले चलूँ इससे मैं झूला बना अपने घर
लम्बी छलांगे लगायी 
फिर भी उससे  छू पाई 
एक बार खूब लगा के ध्यान
लगायी सबसे ऊँची छलांग
लगा इस बार तो छू लिया
रंग सारे  मुठी में भर दिया
मुट्ठी भीचे रही कितने ही सावन
डर था गर खोल दी मुठी तो खो जायेंगे सारे रंग मनभावन
फिर एक ऐसा वक्त आया
आँखों के सामने एक सख्श आया
मिली उस से मेरी नज़रें
वोह मन  को बहुत  भाया
खुल गयी मेरी मुट्ठी
रंग सारे मेरे जीवन में भर आया........

तुम्हारी जीत !!!

कर जाऊं में फिर एक गलती
और तू जीत जाये इस खेल में
तुम्हे क्या पता
क्या  मज़ा है इस मेल में ...
थक जाऊं मैं जब गलतियाँ करते करते
बस एक बार मुस्कुरा देना तुम
और कर दूँगी मैं फिर एक गलती
और तुम फिर जीत जाना इस खेल में

सागर किनारे

धुल रही थी रात उजली चांदनी में
जैसे चांदी  का वर्क चढ़ा दिया हो इस जहाँ पर
बस रेत ही लग रहा था स्वर्णिम सा 
बचपन  में शंख कान से लगा सागर को सुना था
आज आँखों के सामने था सागर
पर लग रहा था स्वर उसका मधिम सा
धडकनों की आवाज़ गूँज रही थी
कभी मैं सागर को देखती ,कभी रेत को 
अचानक मैं बोल उठी  
"देख रहे  हो बैठे है हम तुम यहाँ
पर दिख रही है एक ही परछाई"
कुछ पल देखता रहा मुझे, बिना पलक झपकाए
बोला "यह हमारी ,तुम्हारी परछाई नहीं
यह तोह है उस मन  की परछाई
जिसमे दो मिलकर एक हो गए हैं"
मेरे अधरों पे मुस्कान खेल रही थी
और मैं सोच रही थी.....
कितना सहज है यह प्रेम ........ 

तेरा आना तेरा जाना

तेरा आना तेरा जाना
बहुत हो गया ज़िन्दगी तेरा यूँ लुभाना

इस बार आओ तो  कुछ घंटों के लिए तेरी गोद उधर दे जाना
मौसम में मौसम  ए बहार दे जाना
बैठ सिरहाने लोरी गा जाना
अपने हाथों के थपकिया दे एक मीठी नींद सुला जाना
आँखों में ऐसे सपने भर जाना
मेरे हर सपने को इस बार अपना कर जाना
मेरे हथेली पर अपने प्रीत की निशानी बना जाना
प्यार की एक अनसुनी  अनकही कहानी सुना जाना
 तेरा आना तेरा जाना
बहुत हो गया ज़िन्दगी तेरा यू लुभाना

अपनी एक मुस्कान मेरे होटों पे छोड़ जाना
पतझड़ में पीले हुए पत्तों को शाख से तोड़ जाना
कंठ में मेरे प्रेम स्वर के राग भर जाना
इस बार दिल को एक रोशन ए चराग कर जाना 
दिया इंतज़ार का इस बार बुझा जाना
पालकी बिठा मुझे अपने संसार लिए जाना
तेरा आना तेरा जाना
बहुत हो गया ज़िन्दगी तेरा यू लुभाना

गुलमोहर

एक गुलमोहर को हवा में लहलहाते देखा
था जिसका एक भी पत्ता हरा नहीं !
क्या खुद को पावक लपटों के  कर सुपुर्द वो  डरा नहीं?
हे राम ! ये क्या विडम्बना है,
क्या सीता के एक अग्नि परीक्षा से आपका मन भरा नहीं ??

मेरा वजूद उनसे है

तेरी परछाई हूँ मैं
दिल खुद से ज्यादा तुझपे यकीन करता है !
क्युकी मुझे जिंदा रखने को
तू सदियों से रौशनी-रौशनी फिरता है !!

उनका साथ

आज काँधे  पर फिर उनका हाथ है  
क्यों कौंधा फिर दिल में  वो  ज़ज्बात है  
सबसे अनोखा अनूठा उनका साथ है
इस दुनिया से अलग ही उनकी बात है

सजनी

खाली  खाली  दुपहरिया  
अमवा के पेड़ पे 
कुहू- कुहू  गाये  कोयलिया
पुरवाई जो चले
झूले है  धान की बालियाँ
पर क्यों मुरझाई पड़ी है
सजनी के मन की कलियाँ !!!
दूजा पहर है  दिन का
आई है हौले  से आँखों में निंदिया 
पंखे की हवा लगे है धीमी 
प्यार  से उसके बालों को सहलाता  है पुरवैय्या !!
दूर नदी सूखी पड़ी है 
बारिश को न्योता गा रहा है खेवैय्या 
प्यासा पपीहा भी पीहू पीहू कर
आज बन बैठा है गवैय्या
बुलाता पपीहा सावन को 
तो सजनी कर श्रृगार क्यों ओढ़े है चुनरिया !!
सोचती है इस सावन
आ जायेगा उसका सांवरिया 
फिर न रहेगी उसकी 
खाली खाली दुपहरिया !!!